संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के ख़िलाफ़ भारत के वोट के क्या हैं मायने? पढ़िए पूरी खबर

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इस साल की शुरुआत से ही इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच हिंसा में तेज़ी आई है जिसमें दोनों तरफ़ कई लोग मारे जा चुके हैं.

जहां एक तरफ़ भारत की फ़लस्तीनी लोगों के प्रति नीति पारंपरिक तौर पर सहानुभूतिपूर्ण रही है, वहीं दूसरी ओर पिछले कुछ सालों में इसराइल से भी उसकी नज़दीकियां बढ़ीं हैं. यही वजह है कि इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच चल रहा हिंसा का दौर भारत के लिए एक असमंजस की स्थिति पैदा करता है.

क्योंकि कूटनीतिक स्तर पर भारत की हमेशा यही कोशिश रहती है कि एक संतुलन बनाए रखा जाए.

ऐसे में ये स्वाभाविक है कि भारत का संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के ख़िलाफ़ वोट करना एक चर्चा का विषय बन जाए.

भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में हाल ही में लाए गए उस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया जिसमें इसराइल को 1967 के बाद से क़ब्ज़े वाले इलाक़ों को छोड़ने के साथ-साथ नई बस्तियों की स्थापना और मौजूदा बस्तियों के विस्तार को तुरंत रोकने के लिए कहा गया. साथ ही भारत ने उस प्रस्ताव के पक्ष में भी मतदान किया जिसमें फ़लस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया गया था.

फ़लस्तीन मुद्दे को भारत का समर्थन दशकों पुराना है. साल 1974 में भारत फ़लस्तीन मुक्ति संगठन को फ़लस्तीनी लोगों के एकमात्र और वैध प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने वाला पहला ग़ैर-अरब देश बना था.

1988 में भारत फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता देने वाले पहले देशों में से एक बन गया. 1996 में भारत ने ग़ज़ा में अपना प्रतिनिधि कार्यालय खोला जिसे बाद में 2003 में रामल्ला में स्थानांतरित कर दिया गया था.

बहुत से बहुपक्षीय मंचों पर भारत ने फ़लस्तीनी मुद्दे को समर्थन देने में सक्रिय भूमिका निभाई है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के 53वें सत्र के दौरान भारत ने फ़लस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार पर मसौदा प्रस्ताव को न केवल सह-प्रायोजित किया बल्कि इसके पक्ष में मतदान भी किया था.

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