सरदार पटेल के देहावसान और राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति बन जाने के बाद जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के सर्वेसर्वा बन गए और उन्हें सरकार की नीतियाँ बनाने की पूरी आज़ादी मिल गई.
सरदार पटेल और पुरुषोत्तम दास टंडन से मतभेद होने के बाद नेहरू ने दो सबक सीखे थे. पहला ये कि गृह और रक्षा मंत्री ऐसे होने चाहिए जो उनके प्रति वफ़ादार हों और दूसरा ये कि कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष ऐसा हो जो उनकी बात माने.
उस समय की भारत की राजनीति में कांग्रेस का बोलबाला था, हालांकि उसी दौरान आचार्य कृपलानी ने कांग्रेस से अलग होकर किसान मज़दूर प्रजा पार्टी बना ली थी. मतदाताओं के बीच कम्युनिस्ट पार्टी की एक सीमित लोकप्रियता थी और नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नई पार्टी जनसंघ बनाई थी.
नए आज़ाद हुए देश ने कुछ सालों के भीतर ही वयस्क मताधिकार के आधार पर आम चुनाव करवाने का फ़ैसला किया. इसके ठीक विपरीत पश्चिम में पहले ज़मीन जायदाद रखने वाले लोगों को वोट डालने का अधिकार दिया गया था और मज़दूरों और महिलाओं को वोट डालने के अधिकार से वंचित रखा गया था.
आज़ाद होने के दो वर्षों के भीतर भारत में चुनाव आयोग की स्थापना हो गई थी और मार्च, 1950 में सुकुमार सेन को पहला मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था.