मोदी ने हमलावरों को खुली छूट दे रखी है.

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हिजाब, दाढ़ी, टोपी, अजान, नमाज़, मदरसों, मुसलमानों की छवि खराब करने के प्रयास किए जा रहे है,

बदलता माहौल ऐसे नेताओं का काम आसान कर रहा है, मुसलामानों के ख़िलाफ़ माहौल बना कें, लोगों को भड़काकर अपने पाले में ला रहे है,

ऐतिहासिक रूप से ऐसे कट्टरवादी आंदोलनों के निशाने पर यहूदी, अश्वेत, जिप्सी और अप्रवासी रहे हैं, लेकिन भारत में हिंदू कट्टरवाद भारतीय जनता पार्टी के उभार का नतीजा ये हुआ है कि मुसलमानों को अलग-थलग किया जा रहा है, उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.

जाति-धर्म की दरारें सामाजिक देश को कमजोर कर रही है, कई लोगों ने इस का विरोध भी कर रहे है और सवाल उठा रहे है हैं,

नफ़रत के इस माहौल की जड़ें हिंदुस्तान में ही हैं. हमारे औपनिवेशिक इतिहास में ही मुसलमानों के प्रति नफ़रत की बुनियाद है. लेकिन आज जिस तरह पूरी दुनिया में इस्लाम के प्रति डर और नफ़रत का माहौल बना है, उससे भारत में भी राष्ट्रवाद के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है,

ये एक नए दौर की जंग है, जिसमें सिर्फ और सिर्फ देश के मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है,

हालांकि भारतीय मुसलमानों की मुश्किलों की शुरुआत 2014 के आम चुनावों में बीजेपी की जीत से काफ़ी पहले से ही हो गई थी..

भारत के तरक़्क़ीपसंद संवैधानिक वादों की चमक तो बहुत पहले ही फीकी पड़ने लगी थी. जाति और धर्म के नाम पर समाज में दरारें खुले तौर पर दिखने लगीं थीं.

भाजपा हो या कॉंग्रेस पहले की सरकारें, हमेशा से ही मुसलमानों के प्रति दया भाव तो दिखाती थीं, मगर मोदी सरकार अनदेखी करती आई है,

हिन्दुओं के वोट उन्हें अच्छी शिक्षा स्कूल कॉलेज हॉस्पिटल रोजगार नौकरिया और इंसाफ़ और विकास देने के नाम पर नहीं मांगती, बल्कि हमेशा उनके धर्म के नाम पर भड़काया जाता है, इस्लाम के नाम पर फिर उन्हें ये पार्टियां ये भरोसा देकर वोट मांगती हैं के वो उनकी धर्म हिफ़ाज़त करेंगी,

मुस्लिम समाज का विकास ठप पड़ता गया. तालीम, नौकरी, सेहत और आधुनिकता के मोर्चों पर भारत के मुसलमान बाक़ी आबादी से पिछड़ते ही चले गए.

भारत के मुसलमानों के हालात पर ख़तरे की घंटी बड़े ज़ोर से बज रही है, मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन को लेकर चर्चा होने लगी. मुसलमानो की तस्वीर बेहद खराब हो रही है,

मुसलमानों को नौकरियां भी कम मिल रही हैं, और प्रति व्यक्ति ख़र्च के राष्ट्रीय औसत में भी वो निचली पायदान पर हैं. आला दर्जे की सरकारी सेवाओं में मुसलमानों की मौजूदगी न के बराबर हो गई है,

देश की कुल आबादी में मुसलमान 13.4 फ़ीसदी हैं. मगर प्रशासनिक सेवाओं में केवल 3 फ़ीसदी, विदेश सेवा में 1.8 फ़ीसदी और पुलिस सेवा में केवल 4 फ़ीसदी मुस्लिम अधिकारी हैं.

मुसलमानों में ग़रीबी, पूरे देश के औसत से ज़्यादा है. मुस्लिम समाज की आमदनी, ख़र्च और खपत की बात करें, तो वो दलितों, आदिवासियों के बाद नीचे से तीसरे नंबर पर हैं.

कुंडू कमेटी का मानना है कि सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की तादाद चार फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है.

2013 में कुंडू कमेटी का गठन किया गया, इस कमेटी की रिपोर्ट से मुस्लिम समाज के विकास और सुरक्षा को लेकर कुंडू कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में जो कहा, वो भविष्यवाणी जैसा ही साबित हो रहा है, कमेटी ने अपनी रिपोर्ट के आख़िर में लिखा था, ”मुस्लिम अल्पसंख्यकों का विकास उनकी सुरक्षा की बुनियाद पर होना चाहिए. हमें उन्हें यक़ीन दिलाने के लिए उस राष्ट्रीय राजनैतिक वादे पर अमल करना चाहिए, जो बनावटी ध्रुवीकरण को ख़त्म करने की बात करता है.”

ये बात भविष्यवाणी जैसी सच साबित हुई,

2014 के बाद से मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत भरे अपराधों की कई घटनाएं सामने आई हैं. मुसलमानों को पीटकर मार डालने, ऐसी घटनाओं के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रचारित करने और इस पर पूरी बेशर्मी से जीत की ख़ुशी मनाने की घटनाएं बढ़ी हैं.

भारत में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ ऐसी घटनाओं का आम हो जाना और सरकार का पूरी तरह ख़ामोशी अख़्तियार कर लेना, नई बात है. पहले जो घटनाएं इक्का-दुक्का हुआ करती थीं, वो अब रोज़मर्रा की बातें हो गईं हैं.

मुसलमानों के ख़िलाफ़ सत्ताधारी बीजेपी के नेताओं और मंत्रियों की नफ़रत भरी बयानबाज़ी आम बात हो गई है.

मुसलमान नौकरी मांगें, इंसाफ़ मांगें, मॉल में जाएं, ट्रेन में सफ़र करें, इंटरनेट पर चैटिंग करें, जींस पहनें या अपने मुसलमान होने की खुली नुमाइश करें. मुसलमानों का अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग करना भी उनके लिए ख़तरनाक हो रहा है, वो सोशल मीडिया पर ट्रोल हो सकते हैं. भीड़ उन पर हमला कर सकती है

ऐसे बुरे माहौल में जब आर्थिक तरक़्क़ी की उम्मीद कम दिखती है, तो दूसरों से नफ़रत करके और उन पर हमला कर के ही लोगों को ख़ुशी मिलती है. भारत का संविधान इस देश के नागरिकों का सबसे बड़ा रक्षक है. लेकिन, एक प्रस्तावित क़ानून, धर्मनिरपेक्ष नागरिकता की संविधान की बुनियाद को कमज़ोर करने का काम कर रहा है

माहौल में इतनी नफ़रत से लोगों की खीझ बढ़ रही है लेकिन इस माहौल को बदलने के लिए मुख्यधारा की मौजूदा सियासत में बहुत बड़े बदलाव की ज़रूरत है. साथ ही आम भारतीय के ज़हन और दिल में भी बदलाव की ज़रूरत है.

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