Mumbai : मुंबई की बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) में मेयर पद को लेकर स्थिति अब भी साफ नहीं हो पाई है।
227 सदस्यीय नगर निगम में बहुमत के लिए 114 सीटों की जरूरत होती है, जबकि महायुति ने 118 वार्ड जीतकर यह आंकड़ा पार कर लिया है।
इसके बावजूद सत्ता के शीर्ष पद को लेकर सहयोगी दलों के बीच सहमति नहीं बन सकी है।
यह सस्पेंस दिखाता है कि चुनावी जीत के बाद भी राजनीतिक संतुलन साधना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
ठाकरे परिवार का तीन दशक पुराना दबदबा टूटा, लेकिन नई सत्ता में खींचतान
BMC में लगभग 30 साल तक चला ठाकरे परिवार का वर्चस्व इस चुनाव में समाप्त हो गया।
बीजेपी और शिंदे गुट की शिवसेना ने मिलकर यह ऐतिहासिक बदलाव किया है।
हालांकि सत्ता परिवर्तन के बाद भी स्थिरता नहीं आ सकी है।
मेयर पद को लेकर मतभेद सामने आने से यह साफ हो गया है कि महायुति के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है।
मेयर पद पर अंदरूनी खींचतान ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
सूत्रों के मुताबिक, मेयर पद के कार्यकाल और अधिकारों को लेकर सहयोगी दलों के बीच टकराव है।
बीजेपी और शिंदे गुट, दोनों ही अपने-अपने प्रभाव को बनाए रखना चाहते हैं।
इसी कारण मेयर चयन की प्रक्रिया लटकती नजर आ रही है।
इस खींचतान ने मुंबई की प्रशासनिक स्थिरता को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
खरीद-फरोख्त की आशंका, शिंदे गुट सतर्क मोड में
मेयर चुनाव से पहले कथित खरीद-फरोख्त की आशंका ने राजनीतिक माहौल और गर्म कर दिया।
इसी आशंका के चलते शिंदे गुट ने अपने 29 नवनिर्वाचित पार्षदों को एक फाइव-स्टार होटल में ठहराया।
पार्षदों को तब तक होटल से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई,
जब तक जीत के प्रमाणपत्र और गजट नोटिफिकेशन आधिकारिक रूप से जारी नहीं हुए।
हाई-प्रोफाइल नगर निगम चुनाव, गठबंधन की मजबूती पर सवाल
BMC चुनाव को देश के सबसे हाई-प्रोफाइल नगर निगम चुनावों में गिना जाता है।
ऐसे में मेयर पद को लेकर जारी असमंजस महायुति की रणनीति पर सवाल खड़े करता है।
बहुमत होने के बावजूद सत्ता का संतुलन बनाना चुनौती बन गया है।
आने वाले दिनों में होने वाला फैसला महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।


