आखिर दुनिया के नक्शे पर मौजूद बाकी तमाम देशों की तुलना में भारत में ही तस्करी करके लाई या पहुंचाई गई “ड्रग” की खेप या खेपें सबसे ज्यादा क्यों पकड़ी जाती है? क्यों भारत ही ड्रग उत्पादक और ड्रग तस्कर देशों की पहली पसंद बना हुआ है?
भारत के तमाम एंटी ड्रग तस्करी ऑपरेशंस को अंजाम दे चुके एक्सपर्ट्स की नजर में तो, इन सवालों का संक्षिप्त और कमोबेश एक सा ही जवाब है. “भारत में अपने खर्चे पानी पर खुद की अकाल मौत के खरीददारों की भरमार होना.” हाल ही में देश में एमडीएमए जैसे ड्रग की खेप-खरीद फरोख्त के सिलसिले में जबसे जामनगर के दो पायलेट्स का नाम उछला है, तब से लोगों के जेहन में यह सवाल और भी ज्यादा तेजी से कौंधने लगा है. आइए जानते हैं कि आखिर यह एमडीएमए (MDMA Drug) में आखिर ऐसा क्या है, जिसकी कोई भी खेप पकड़े जाने या फिर इसका भारत में इस्तेमाल होते किसी के पकड़े जाने पर बवाल मच जाता है.
आखिर भारत ही क्यों है ड्रग तस्करों की पसंद?
उनका इस्तेमाल मगर वे अपनी युवा पीढ़ी को नहीं करने देते हैं, जबकि ड्रग उत्पादक देशों को भारत और उसके युवा इसके लिए सबसे ज्यादा मुफीद मालूम पड़ते हैं, जिसके चलते भारत के वे पड़ोसी देश जो ड्रग उत्पादन में अव्वल हैं.
सबसे पहले और सबसे ज्यादा तादाद में अपने ड्रग्स की खपत भारत में ही करने को उतावले रहते हैं. इस बारे में टीवी9 भारतवर्ष ने बात की दिल्ली पुलिस नारकोटिस्क सेल के पूर्व डीसीपी और रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी दर्शन लाल कश्यप से बकौल डीएल कश्यप, “दरअसल जिस तरह से हमारी युवा पीढ़ी खुद को मॉडर्न बताने, जताने के फेर में फंसकर ड्रग्स के सेवन में आकंठ डूबी है.
वहीं ड्रग उत्पादक देशों द्वारा हमारे देश में अपने उत्पादित ड्रग की आपूर्ति का प्रमुख या कहिए पहला कारण है. ड्रग उत्पादक देश बखूबी समझ चुके हैं कि, उनका ड्रग सबसे पहले कम समय में और आसानी से हाथों-हाथ भारत में खप-बिक सकता है. इसलिए वे हमारे देश के अंदर ही अपने ड्रग्स की सप्लाई को लेकर हमेशा सचेत रहते हैं. इसमें मैं इतना देश ड्रग सप्लायर और ड्रग उत्पादक देशों को नहीं दूंगा, दोष हमारा है जो हम उनके ड्रग्स की अपने यहां खपत अंधाधुंध करते हैं. अगर हमारे यहां ड्रग लेने वालों की संख्या कम हो जाए. या रहे ही न, तो ड्रग उत्पादक देश भारत के बजाए किसी और देश की युवा पीढ़ी को ड्रग्स से बर्बाद करके, अपने खजाने भरने का रास्ता तलाशेंगे.”
यहां बताना जरूरी है कि, अफगानिस्तान स्थित नांगरहर, शेरजाद व अचिन जैसे इलाकों में, ड्रग उत्पादन (विशेषकर अफीम की खेती) खुलेआम होती है. अफगानिस्तान में कुछ वक्त पहले तक तो तालिबान अफीम किसानों से 10 प्रतिशत टैक्स तक वसूला करता था. भले ही आज वो अपने यहां अफीम की खेती पर पाबंदी का राग क्यों न अलापता हो. इतना ही नहीं तालिबान ड्रग्स की सप्लाई पर 10 से 20 फीसदी टैक्स वूसली भी करने के लिए बदनाम रहा है. एक अनुमान के मुताबिक तालिबान को मिलने वाले कुल राजस्व में से करीब 60 फीसदी हिस्सा इन्हीं दोनों टैक्स से हासिल होता है.
बात अगर अमेरिका की करें तो उसने 2001 में अफगानिस्तान में हफीम की खेती और वहां से, नशीले पदार्थों के दुनिया भर में निर्यात पर पाबंदी लगाने की नाकाम कोशिशें की थीं. अफगानिस्तान के लिए अमेरिका की तरफ से उस जमाने में तैनात किए गए एक स्पेशल इंस्पेक्टर की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने 2002 से 2017 के बीच, अफगानिस्तान में ड्रग्स के उत्पादन और व्यापार पर रोक के लिए 8.6 अरब डॉलर (करीब 63,525 अरब रुपये) खर्च कर डाले थे. अब से पूर्व की अशरफ गनी सरकार ने ड्रग उत्पादन पर भी रोक लगाई थी लेकिन, अब यह फिर से शुरू हो गया है.