Uttar Pradesh : वाराणसी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गौ-माता, मंदिरों और सनातन संस्कृति की रक्षा के उद्देश्य से ‘चतुरंगिणी सेना’ के गठन की घोषणा की है। इस संगठन का संचालन 20 विभागों में किया जाएगा और इसकी निगरानी स्वयं शंकराचार्य करेंगे।
शंकराचार्य ने कहा कि वर्तमान समय में धर्म की रक्षा के लिए केवल शास्त्र-चर्चा पर्याप्त नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार शस्त्र का भी सहारा लेना पड़ सकता है। इस पहल को भगवान परशुराम के संकल्प से जोड़ते हुए धर्म और समाज की सुरक्षा का संदेश दिया गया।

यह संगठन देशभर में सक्रिय रहकर गौ-संरक्षण, मंदिरों की सुरक्षा और सनातन प्रतीकों के संरक्षण का कार्य करेगा। साथ ही, समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करने और सनातनियों में बढ़ते भय को समाप्त करने का लक्ष्य भी रखा गया है।
‘चतुरंगिणी सेना’ का ढांचा प्राचीन भारतीय सैन्य प्रणाली पर आधारित है, जिसमें 9 स्तरों की पदानुक्रम व्यवस्था बनाई गई है। इसमें पत्तिपाल से लेकर महासेनापति तक विभिन्न पद शामिल होंगे, जबकि शीर्ष स्तर पर परमाध्यक्ष, सर्वाध्यक्ष और संयुक्त सर्वाध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी।
संगठन को चार प्रमुख अंगों—मनबल, तनबल, जनबल और धनबल—में विभाजित किया गया है। प्रत्येक अंग के अंतर्गत पांच-पांच विभाग कार्य करेंगे, जिससे कुल 20 विभागों के माध्यम से सेना का संचालन किया जाएगा। मनबल के अंतर्गत संत, विद्वान, पुरोहित, वकील और मीडिया शामिल होंगे, जबकि तनबल में शारीरिक और शस्त्र प्रशिक्षण से जुड़े दल रहेंगे। जनबल में विभिन्न श्रेणियों के स्वयंसेवक और धनबल में दानदाताओं की भूमिका निर्धारित की गई है।
इस संगठन की सबसे छोटी इकाई ‘पत्तिपाल’ होगी, जो 10 सदस्यों की टीम का नेतृत्व करेगी। विशेष बात यह है कि इस सेना में पुरुष, महिला और तृतीय लिंग के लोगों को भी शामिल करने की बात कही गई है।
शंकराचार्य के अनुसार, यह पहल सनातन समाज को संगठित कर उसे आत्मविश्वास और सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
वाराणसी | विशेष रिपोर्ट

