Mumbai : मुंबई, 20 फरवरी 2026 | विशेष प्रतिनिधि
सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत समय पर जानकारी न देने वाले एक अधिकारी पर लगाए गए 25 हजार रुपये के जुर्माने को मुंबई उच्च न्यायालय ने पूरी तरह सही ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सूचना आयुक्त द्वारा लगाया गया दंड कानून के अनुरूप है और इसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।
यह मामला राज्य सूचना आयोग द्वारा एक लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर लगाए गए आर्थिक दंड से जुड़ा था, जिसे संबंधित अधिकारी ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। हालांकि अदालत ने उनकी याचिका खारिज करते हुए आयोग के आदेश को बरकरार रखा।
मामले में अभिजीत अनप, जो उस समय लोक सूचना अधिकारी (PIO) के रूप में कार्यरत थे, ने एक आरटीआई आवेदक को निर्धारित समय सीमा में जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। RTI अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी 30 दिनों के भीतर देना अनिवार्य है।
बताया गया कि संबंधित मामले में जानकारी देने में 200 से अधिक दिनों की देरी हुई। कानून के अनुसार, यदि जानकारी देने में देरी होती है तो प्रति दिन 250 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है, जिसकी अधिकतम सीमा 25,000 रुपये है।
राज्य सूचना आयुक्त ने देरी को गंभीर मानते हुए अधिकतम 25 हजार रुपये का दंड लगाया। हालांकि दंड निर्धारण में 100 दिनों की देरी को आधार माना गया था, जबकि वास्तविक देरी 200 से अधिक दिनों की बताई गई।
अधिकारी का पक्ष
अधिकारी की ओर से यह तर्क दिया गया कि एक सरकारी आदेश (GR) के कारण भ्रम की स्थिति बनी थी, जिसकी वजह से जानकारी समय पर नहीं दी जा सकी। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने सूचना आयुक्त द्वारा जारी “कारण बताओ नोटिस” का जवाब दिया था और उनकी बात पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
इसी आधार पर उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर दंड रद्द करने की मांग की।
अदालत का निर्णय
20 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेसन की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई की। सरकार की ओर से अधिवक्ता कविता सोलुंखे ने दलील दी कि सूचना आयुक्त का आदेश पूरी तरह कानून सम्मत है और देरी का पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा:
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ है और अधिकारी को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया था।
अंततः अदालत ने अधिकारी की याचिका खारिज कर दी और सूचना आयुक्त के आदेश को वैध ठहराया।
फैसले का महत्व
यह निर्णय RTI कानून की सख्त अनुपालना का स्पष्ट संकेत देता है। अदालत के इस रुख से यह संदेश गया है कि सूचना देने में लापरवाही या अनावश्यक देरी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए चेतावनी के रूप में देखा जाएगा। सूचना के अधिकार को नागरिकों का वैधानिक अधिकार बताते हुए अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि पारदर्शिता और जवाबदेही की प्रक्रिया में ढिलाई करने वालों को आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा।
यह फैसला उन नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो RTI के माध्यम से सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने का प्रयास करते हैं। अदालत का यह निर्णय सूचना के अधिकार की मजबूती और उसकी प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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