लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया

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नई दिल्ली, 11 फरवरी 2026: संसद के बजट सत्र के बीच विपक्ष ने एक ऐतिहासिक और संवैधानिक कदम उठाते हुए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) का नोटिस विधायकों के हस्ताक्षर के साथ लोकसभा महासचिव के पास सौंपा है। यह राजनीतिक संकट पूरा संसद शून्य की निगाह से देख रहा है, क्योंकि यह प्रस्ताव सदन के सर्वोच्च पदाधिकारी के खिलाफ लाया गया है — एक दुर्लभ और संवैधानिक प्रक्रिया।

क्या हुआ और कैसे?

मंगलवार, 10 फरवरी 2026 को कांग्रेस, DMK, समाजवादी पार्टी, RJD और वामपंथी दलों के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन ने लोकसभा महासचिव को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपा। इस नोटिस पर लगभग 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं।

नोटिस लोकसभा सचिवालय को 1:14 बजे दिया गया, जिसमें विपक्ष ने कह दिया कि स्पीकर ने संसदीय प्रक्रियाओं को पक्षपातपूर्ण ढंग से संचालित किया है।

स्पीकर ओम बिरला ने नोटिस मिलने के बाद लोकसभा सचिवालय को निर्देश दिया कि सूचना की जांच करें और प्रक्रिया को तीव्र बनाएं।

विपक्षी आरोप: क्या कहा गया है?

विपक्षी दलों ने प्रस्ताव में कई गंभीर आरोप लगाए हैं:
पक्षपात — कहा गया है कि स्पीकर ने न्यायसंगत तरीके से सभी सांसदों को बोलने का अवसर नहीं दिया।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को समय न मिलना — विशेष रूप से बुध चर्चा में राहुल गांधी को पूरी बात कहने का मौका न मिलने को बड़ा मुद्दा बताया गया।

सदन में विपक्षी सांसदों का निष्कासन — कई विपक्षी सांसदों को सत्र के बाकी हिस्से के लिए निलंबित किए जाने पर भी सवाल उठाया गया।

अनुचित नियम-अनुपालन — विपक्ष का दावा है कि नियमों के कठोर व्याख्याओं से सत्तापक्ष को लाभ पहुंचाया गया है, जिससे हंगामे बढ़े हैं।

संवैधानिक प्रक्रिया और नियम

संविधान के अनुच्छेद 94(c) और नियम 94C के तहत ही स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया संभव है। इसके मुख्य बिंदु हैं:

🔹 स्पीकर को हटाने के लिए न्यूनतम 14 दिन का नोटिस देना अनिवार्य है।
🔹 इसके बाद सदन में एक प्रस्ताव पारित होना चाहिए, जिसमें सदस्यों की अधिकांश संख्या से समर्थन मिलना जरूरी है।
🔹 विचाराधीन प्रस्ताव के दौरान स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते, और यदि वह उपस्थित भी हों तो उन्हें आसन छोड़ना होता है।

इतिहास में ऐसे प्रयास कई बार हुए हैं, लेकिन किसी भी स्पीकर की कुर्सी नहीं गई है। कांग्रेस और विपक्षी दल इसका हवाला देते हैं कि यह कदम लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

ओम बिरला की प्रतिक्रिया और सदन में ताजा स्थिति

नोटिस के तुरंत बाद ओम बिरला ने निर्णय लिया कि वह तब तक सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे जब तक प्रस्ताव पर चर्चा और निर्णय नहीं हो जाता। यह कदम नियम के अनुसार भी आवश्यक होता है कि प्रस्ताव विचाराधीन रहते हुए स्पीकर अध्यक्षता न करें।

राजनीतिक और संवैधानिक मायने


इस कदम को राजनीतिक विश्लेषक संसदीय लोकतंत्र के प्रति विपक्ष की चुनौती के रूप में देखते हैं — यह दर्शाता है कि विपक्ष सरकार तथा संसदीय नेतृत्व की कार्यप्रणाली से कितनी नाराज है। इसके बावजूद, वास्तविकता यह है कि अर्थशास्त्र और सदन में बहुमत दोनों ही पक्ष के लिए निर्णायक होंगे।

कई पुराने मामलों में भी ऐसी प्रस्ताव विफल रहे हैं क्योंकि सत्तापक्ष के हस्ताक्षर स्पीकर के समर्थन में पर्याप्त रहे हैं।

अब आगे क्या होगा?

🔹 संसदीय प्रक्रिया के अनुसार प्रस्ताव पर चार्ज और बहस मई से पहले हो सकती है।
🔹 यदि बहुमत प्रस्ताव का समर्थन करता है, तो स्पीकर का पद स्वतः समाप्त हो सकता है।
🔹 यदि प्रस्ताव असफल रहता है, तो विपक्ष को संसदीय लड़ाई में नई रणनीति बनानी पड़ेगी।

निष्कर्ष: यह कदम भारतीय संसद की राजनीति में एक बड़ा और असामान्य कदम है — जिसमें विपक्ष ने स्पीकर कार्यालय के संचालन और निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। यह मामला अब कानूनी, संवैधानिक और राजनीतिक तीनों मोर्चों पर आगे की लड़ाई की ओर बढ़ रहा है।

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